मेहमान कि मानिंद रहता हु यहाँ
मुझे मेरा घर ही मेरा क्यू नहीं लगता
खुले दिल से मैं यहाँ क्यू जी नहीं सकता
यहाँ कोई क्यू मुझे अपना नहीं लगता
मुद्दतो से ख्वाब देखा था इक हमराह का
वक़्त आया तो ये जाना वो इक ख्वाब था
ज़िंदगी ख्वाब की मानिंद तो होती नहीं
ज़िंदगी की राह मनचाही सदा होती नहीं
अशोक जौहरी
मुझे मेरा घर ही मेरा क्यू नहीं लगता
खुले दिल से मैं यहाँ क्यू जी नहीं सकता
यहाँ कोई क्यू मुझे अपना नहीं लगता
मुद्दतो से ख्वाब देखा था इक हमराह का
वक़्त आया तो ये जाना वो इक ख्वाब था
ज़िंदगी ख्वाब की मानिंद तो होती नहीं
ज़िंदगी की राह मनचाही सदा होती नहीं
अशोक जौहरी
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