शीत गीत .......
ये शीत लहर ,ये ठिठुरन
ये ठंडी -ठंडी सांसे
ये आसमान का जमना
कैसा अजीब है लगता
सूरज के बिना सबेरा
एक दर्द बन गया है
हर रात चाँद का उगना
मेरे पड़ोस की सभी छतें
कोहरे में डूबी ढकी हुई
कुछ दूर नीम से चिपकी है
या पीपल में अटकी हुई है
खपरैलों पर पाला बिखरा है
गालियाँ ओले सी ठंडी है
कुत्ते तो कही नहीं दिखते
गाएँ बोरों में लिपटी हुई
सहमी-सहमी सी लगती है
मै ओवरकोट के ऊपर
ऊनी दुशाला ओढ़े
दांतो को किट -किट करता
खिडकी से झांक रहा हूँ
कि इतने में कुण्डी खटकी
मैंने जो नीचे देखा -----
तो कुत्ते से अधिक अभागे
गाए से ज्यादा सहमे
महरी के दो बच्चे
मैले कपड़ो में लिपटे
बेमन से खड़े हुए थे
कपड़े भी फटे -फटे थे
मैंने आँखों से देखा
और एक कंपकंपी छूटी ----
इन भूके बच्चों का
इस भूकी पीढ़ी का
एक दर्द बन गया है
हर रोज़ पेट का पलना
एक दर्द बन गया है
हर रात चाँद का उगना
अशोक जौहरी
ये शीत लहर ,ये ठिठुरन
ये ठंडी -ठंडी सांसे
ये आसमान का जमना
कैसा अजीब है लगता
सूरज के बिना सबेरा
एक दर्द बन गया है
हर रात चाँद का उगना
मेरे पड़ोस की सभी छतें
कोहरे में डूबी ढकी हुई
कुछ दूर नीम से चिपकी है
या पीपल में अटकी हुई है
खपरैलों पर पाला बिखरा है
गालियाँ ओले सी ठंडी है
कुत्ते तो कही नहीं दिखते
गाएँ बोरों में लिपटी हुई
सहमी-सहमी सी लगती है
मै ओवरकोट के ऊपर
ऊनी दुशाला ओढ़े
दांतो को किट -किट करता
खिडकी से झांक रहा हूँ
कि इतने में कुण्डी खटकी
मैंने जो नीचे देखा -----
तो कुत्ते से अधिक अभागे
गाए से ज्यादा सहमे
महरी के दो बच्चे
मैले कपड़ो में लिपटे
बेमन से खड़े हुए थे
कपड़े भी फटे -फटे थे
मैंने आँखों से देखा
और एक कंपकंपी छूटी ----
इन भूके बच्चों का
इस भूकी पीढ़ी का
एक दर्द बन गया है
हर रोज़ पेट का पलना
एक दर्द बन गया है
हर रात चाँद का उगना
अशोक जौहरी
No comments:
Post a Comment