ज़िंदगी -चार दिन
ज़िंदगी के चार दिन थे
उसमे बचे अब एक आधे
जो भी अपने थे करीबी
लग रहे क्यों वे पराए
हम बड़े तो हो गए
पर दिल हुए छोटे हमारे
प्यार की छाई हुई थी धूप
विश्वास के महके हुए थे फूल
वक़्त कि बदरी यूं छाई
फूल मुरझाए बचे बस शूल
काश वो दिन लौट आए
प्यार महके फूल मुस्काए
अशोक जौहरी
ज़िंदगी के चार दिन थे
उसमे बचे अब एक आधे
जो भी अपने थे करीबी
लग रहे क्यों वे पराए
हम बड़े तो हो गए
पर दिल हुए छोटे हमारे
प्यार की छाई हुई थी धूप
विश्वास के महके हुए थे फूल
वक़्त कि बदरी यूं छाई
फूल मुरझाए बचे बस शूल
काश वो दिन लौट आए
प्यार महके फूल मुस्काए
अशोक जौहरी
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