खोल गई राज़----
गुनगुनी हवाओ के अखड़ से झोके ने
धोके से खोल दिया मुझसे ये राज
लगता है बदल गया मौसमी मिज़ाज़
गेंदे के फूलो से भरी-भरी क्यारी
खेतो ने ओढ़ी है सरसों कि साड़ी
सडक़ो पर टंक गए पत्तियो के फाल
बौराई डालो ने खोला ये राज़
मन कि कलिओं में टीस लगी उठने
दिल कि गहराई में उग आए सपने
भावुक मन ऐसे में लगता है बहने
भौरों ने फूलो से खोला ये राज़
पग ने पहचानी अब पनघट कि राह
जीने कि तबसे क्यों बढ़ गई है चाह
तनहा दोपहरी सा मन भरे आह
प्यासी गौरैया ने खोला ये राज़
खोए नयन व्याकुल मन जादू सा जगा तन
सपनीली राहों से लांघते उम्र के पहाड़
यौवन कि देहरी पर कांपते सब्र के किवाड़
कोयलिया कुहुक कर खोल गई राज़
अशोक जौहरी
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