Wednesday, November 20, 2013

सुबह -सुबह सी नहीं ....

सुबह -सुबह सी नहीं ,शाम -शाम सी नहीं 
हर पहर छा गया है धुँआ ही धुंआ 
रोशनी लग रही रोशनी सी नहीं 
हर दिया  लग रहा है भटकती शमा 
रास्ते  सो रहे कोई राही  नहीं 
कल जहा से गुज़र गए कई कारवां 
जमी वीरान है दूर तक कोई दीखता नहीं 
कितना अनजान लगता है ये आसमा 
कितने दिन हो गए नींद आई नहीं 
जो सुला दे मुझे उनकी लोरी कहाँ 

                                   अशोक जौहरी 

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