मन भटकता है
मन भटकता है अकेले इस भरे पूरे शहर में
है कहां वह ठांव मुझको मिले पल भर छांव
धूप कि तपती दोपहरी सा जला मन
ढूंढता हर ओर जैसे प्यार की एक छांव
शहर में भटके मुसाफिर सा थका मन
हो व्यथित फिर खोजता है आज अपना गांव
राह जितनी चली हमने दूर उतने आ गए
और चलने को नहीं उठते ये मेरे पांव
अशोक जौहरी
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