सुबह --
एक और दिन जी लेने की ख़ुशी
दोपहर --
कमर तोर मजदूरी
शाम--
राहत और चाय की चुस्की
रात --
म्रत्यु के पालने में
टूट गए स्वपन सी
एक झपकी
खीज - खीज कर,
राह गया हूँ
कभी तो ऐसा वक़्त होता
जब क़र्ज़ ली हुई साँसे
और खर्च न होती.
एक और दिन जी लेने की ख़ुशी
दोपहर --
कमर तोर मजदूरी
शाम--
राहत और चाय की चुस्की
रात --
म्रत्यु के पालने में
टूट गए स्वपन सी
एक झपकी
खीज - खीज कर,
राह गया हूँ
कभी तो ऐसा वक़्त होता
जब क़र्ज़ ली हुई साँसे
और खर्च न होती.
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