Tuesday, October 12, 2010

और खर्च न होती

सुबह --


एक और दिन जी लेने की ख़ुशी

दोपहर --

कमर तोर मजदूरी

शाम--

राहत और चाय की चुस्की

रात --

म्रत्यु के पालने में

टूट गए स्वपन सी

एक झपकी

खीज - खीज कर,

राह गया हूँ

कभी तो ऐसा वक़्त होता

जब क़र्ज़ ली हुई साँसे

और खर्च न होती.

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