Sunday, November 17, 2013

      
 खो भी नहीं सकते 

न तुमको छोड़ सकते है 
तेरे हो भी नहीं सकते 
ये कैसी बेबसी है कि 
हम रो भी नहीं सकते 
ये कैसा दर्द है दिल में 
हर पल तडपाए  रखता है 
तुम्हारी याद में डूबे हुए 
हम ,सो भी नहीं सकते 
छुपा सकते न दिखा सकते है 
 हम या रब 
कुछ ऐसे दाग है दिल पर 
जो हम धो भी नहीं सकते 
सोचा था कि एक दिन 
छोड़ जाएगे ये दुनिया 
तुम्हे पा तो नहीं सकते 
पर यो खो भी नहीं सकते  


उदास पांव 

शाम आती है 
उदास पांव से 
रोशनी पर सियाही पोत जाती है 
रात के साए 
काले ,सुरमई और फिर रुपहले 
हो जाते है 
चाँद तारे सभी दिल को लुभाते है 
पर आज फिर 
रोज कि तरह 
मेरे ख्वाब 
क्वाँरे के क्वाँरे 
रह जाते है 
कल सबेरा फिर आएगा 
रौशनी ताज़गी 
और उम्मीद के साथ 
दिन बीतते न बीतते 
वह फिर से  छल जाएगा 
कल फिर आएगा 
उदास पांव से 

Friday, November 15, 2013

फ़ैल रही आग से देश को बचाओ

इनकी मत मानो ,इनको मनाओ
फ़ैल रही आग से देश को बचाओ
भटके कदम जो रस्ते पर लाओ
वक़्त कि पुकार है, फ़र्ज़ निभाओ
            फैला अगर देश में खुनी आतंक
            क्या होगा धरती कि माटी का रंग
            बहकाया किसने देश के सपूतो
            क्यों छेड़ रखी है घर में ही जंग
चाहे कश्मीर हो या हो   पंजाब
चाहे कोई धर्म हो कोई हो जात
कोई भी भाषा हो कोई विश्वास
सब माँ भारती के ही है  अंग
            सुन्दर सी बगिया, महकी पुरवैया
            गांव -गली चिहुक रही सोनचिरैया
            आए लुटेरे सब लूट कर चले गए
            अब देशी लुटेरो से इसको बचाओ।  
    

Saturday, November 9, 2013

स्वार्थ की आँधी 

स्वार्थ की आंधी में देश खड़ा मौन क्यों 
आदमी ने आदमी को इस कदर बांटा 
हिलमिल कर रह रहा सदियों से भारती 
कुर्सी पर बैठे जो उनका क्या घाटा 
परदादे जिनके आपस में  सगे भाई थे 
उनके ही बच्चो में नहीं कोई नाता है 
ये मेरा अल्ला ,  ये मेरा ईश्वर  है 
टुकड़ो में बंट गया विश्व का विधाता 
कलिओं  को चटखना     

जीवन है अगर अपना जीना तो पढ़ेगा 
रो -रो के ही हसिये मगर हसना तो पढ़ेगा 
 अँधेरी सूनी सी है  राहें औ तूफानी  हवाए 
मंज़िल पे पहुचना है तो चलना तो पढ़ेगा 
जब उम्र के योवन में तूफ़ान सा आए 
कश्ती को किनारे कही करना तो पढ़ेगा 
जब दर्द कि लहरे हो तारो सी कैसे सांसे 
तब शब्द को गीतो में ढलना तो पढ़ेगा 
जब रूठा हुआ यार आ के द्वार थपथपाए 
मन में पढ़ी गांठो को खुलना तो पढ़ेगा 
जब  कलिओ को हवा प्यार कि सहलाए 
तब  कलिओ को  चटखना   तो पढ़ेगा  

Tuesday, October 29, 2013

गीत बैरी हो गए 

गीत  बैरी हो गए 
शब्द मेरे थे मगर 
सब भाव तेरे हो गए 
दर्द कि लहरे उठी 
तो दिल मेरा रोया बहुत 
नयन मेरे थे मगर 
सब अश्क तेरे हो गए 
ज़िंदगी ने है दिया 
कुछ ऐसा सिला 
प्रीत तूने थी करी 
पर पीर मेरी हो गई 
गीत बैरी हो गए 
सब मीत बैरी हो गए 
                  जौहर। 
गांधी 

एक लाठी  डेढ़ हड्डी 
ढाई अक्छर सत्य के 
प्रेम  की धोती लपेटे 
भीड़ को संग -संग समेटे 
सोते भारत को जगा कर 
उसकी आज़ादी दिल कर 
तुम  कहाँ खो गए पितामह ?
जिन रास्तो को जोड़ के तुमने 
आज़ादी का चौक बनाया 
उसी चौक से आज ये राही 
उलटे पथ को लौट चुके है 
ओठों पर है नाम तुम्हारा 
मन में खुद को पूज रहे है 
ये कैसी पूजा है ?
और कैसे है हम पुजारी ?
हत्या और पूजा में भेद नहीं समझते 
पूजा करने को ,हत्या करना भी है 
कितनी बढ़ी लाचारी 
पहले तुमको गोली मारी 
फिर तुम्हारी तस्वीर  मढ़वा कर 
सरकारी विज्ञापन सी 
पूजा कर डाली। 
                 अशोक जौहरी