गांधी
एक लाठी डेढ़ हड्डी
ढाई अक्छर सत्य के
प्रेम की धोती लपेटे
भीड़ को संग -संग समेटे
सोते भारत को जगा कर
उसकी आज़ादी दिल कर
तुम कहाँ खो गए पितामह ?
जिन रास्तो को जोड़ के तुमने
आज़ादी का चौक बनाया
उसी चौक से आज ये राही
उलटे पथ को लौट चुके है
ओठों पर है नाम तुम्हारा
मन में खुद को पूज रहे है
ये कैसी पूजा है ?
और कैसे है हम पुजारी ?
हत्या और पूजा में भेद नहीं समझते
पूजा करने को ,हत्या करना भी है
कितनी बढ़ी लाचारी
पहले तुमको गोली मारी
फिर तुम्हारी तस्वीर मढ़वा कर
सरकारी विज्ञापन सी
पूजा कर डाली।
अशोक जौहरी
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