मन भटकता है अकेले इस भरे पुरे जंहा में
है कहा वह ठाव मुझको मिले पल भर छाव
धुप की तपती दुपहरी सा जला मन
ढूढता हर ओर जैसे प्यार की एक छांव
राह जितनी चली ,दूर उतने आ गए है
और चलने को उठते नहीं अब पाओ
शहर में भटके मुसाफिर सा थका मन
हो व्यथित फिर खोजता है आज अपना गाओ।
Wednesday, October 6, 2010
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