रंग गया है आसमान सिंधूरी पत्ते सा
और आदमी है उदास बेवा के मत्थे सा
रीत गया दीप मगर बाती अध् जली है
राह अभी चलने को शेष बहूत पढ़ी है
सो गया है चित्रकार आसमान रंग कर के
आदमी की मुस्कान रंगने को पढ़ी है .
अनपढ़, गरीबी, बीमारी , भुकमरी
गाँव -गाँव ,गली -गली बरगद सी खड़ी है
समितिया ,आयोग ,राहत ये बाँट रहे
कुर्सी पर नज़र इनकी कील सी गड़ी है
अशोक जौहरी
और आदमी है उदास बेवा के मत्थे सा
रीत गया दीप मगर बाती अध् जली है
राह अभी चलने को शेष बहूत पढ़ी है
सो गया है चित्रकार आसमान रंग कर के
आदमी की मुस्कान रंगने को पढ़ी है .
अनपढ़, गरीबी, बीमारी , भुकमरी
गाँव -गाँव ,गली -गली बरगद सी खड़ी है
समितिया ,आयोग ,राहत ये बाँट रहे
कुर्सी पर नज़र इनकी कील सी गड़ी है
अशोक जौहरी
1 comment:
awesome mamujaan...i always knew u hav loads of words n beautiful thots in yor mind imprisoned from a long time...waiting for a blank paper to be visible to every1...
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