मिला तुम्हे जो मीत
न बिछुरे,
चाहे बुझ जाए हर दीप ।
गगन में
काले बादल उमर्णे
और घिर आए तम शीत ।
व्यथा में तू उलझा हो ,
होती हो हर पीर ,
किन्तु कभी जब
बिजली कढ़के ,
और समीप की प्रथ्वी उभढ़े ,
तो अपने को प् एकाकी ,
न हो तू भयभीत ,
कही पर दिखे तुम्हारा मीत ।
मिला तुम्हे जो मीत न बिचुढ़े....
न बिछुरे,
चाहे बुझ जाए हर दीप ।
गगन में
काले बादल उमर्णे
और घिर आए तम शीत ।
व्यथा में तू उलझा हो ,
होती हो हर पीर ,
किन्तु कभी जब
बिजली कढ़के ,
और समीप की प्रथ्वी उभढ़े ,
तो अपने को प् एकाकी ,
न हो तू भयभीत ,
कही पर दिखे तुम्हारा मीत ।
मिला तुम्हे जो मीत न बिचुढ़े....
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